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शनिवार, 6 जून 2020

हमारा भारत कितना महान देश है !

सोचता हूँ ! कोरोना महामारी ने हमें और हमारा देश को कहाँ खड़ा कर दिया है यह वही हमारा भारत देश है जिसे महान होने का दंभ बचपन से सिखाया जा रहा  है और हाँ ! हमें आज भी गर्व  है की हमारा भारत सचमुच में एक महान देश है।

तालाबंदी के दूसरे चरण के  बाद से ही आये दिन मजदूरों की  मौत के  समाचार मिलते आ रहा है , कभी रेल की पटरिओं पे चलने  से या उसपर सोने से , तो कभी लाखों मजदूरों और गरीबों  की जान भूख (कोरोना से पहले ) से जा रहा है और सैकड़ों लोग पैदल जाने पे मजबूर अपनी जान दे रहे हैं, 21 वीं शताब्दी में भी हजारों  किलोमीटर मजदूरों का पैदल यूँ चलने पे मजबूर होना  और जब भारत की गाथा गाता है  तब हमें लगता है हमारा भारत कितना महान देश है ! 

कुछ लोग कहते हैं की अज्ञानता वश, मूर्ख मजदूरों ने जान दे रहें  हैं, रेल की पटरियाँ चलने या सोने के लिए होते हैं। तो क्या जो मजदूर भूखे मर रहें हैं या जो हजारों किलोमीटर  पैदल चलने को मजबूर हैं  और तो और  दो वक़्त की रोटी के इंतजार में अपनी मौत के काल में जाने को मजबूर हैं  तो उनका क्या? तो हम कहते हैं  साहब ! इन्हे तो अज्ञान और मूर्ख भी तो हमने ही बना के रखा है ना । आजादी के इतने सालों के बाद भी हम इन्हे साक्षर तो छोड़ एक जागरुक इंसान भी नहीं बना पाए है या एक मानवीय सोच की उपज भी  इनके अंदर नहीं डाल पाए की वे लोग इतनी तो सोच सके की रेल की पटरिओं पे चलने से पहले या सोने से पहले या हजारों किलोमीटर पैदल चलने से पहले यह सोच ले की  क्या सही है या गलत। दो  वक़्त के रोटी कमाने के लिए इतने हजारों मील दूर आने की क्या जरूरत है ये तो अपने गाँव  में या आसपास के शहरों में भी कुछ काम कर गुजारा कर सकते हैं। ये  कहना या हमें लिखना आसान है लेकिन शायद उन्हें समझाना बड़ी कठिन भी नहीं था।  सच तो यह है की हमने मजदूरों ,गरीबों और दबे कुचलों समाज को मुख्य धारा से जोड़ने का कभी प्रयास भी नहीं किया और अगर ऐसा होता तो आज भारत का निर्माता (मजदूर ) दर -दर  ठोकरे नहीं खाता और उसकी जिंदगी ऐसे ही नहीं जाती और जब भारत अपनी  विकसित की परिभाषा गढ़ता है तब हमें लगता है हमारा भारत कितना महान देश है !

सैंकड़ो किलोमीटर पैदल चलकर रेल की पटरिओं पे आराम करते मजदूर 

कोरोना से मरने वालों की गिनती तो रोज हो रही है बड़े बड़े अक्षरों में समाचार चैनलों पे या समाचार पत्रों में दिखाया जा रहा है की कहाँ और कब  कितनी मौतें  हुई है और कौन सा राज्य अभी आगे चल रहा है यह भी अपने आप पे एक  बिडम्बना ही है की हम मौत की गिनती करने बैठे हैं और कही कोई राज्य कम ना आकड़े दिखाये  इसके लिए भी जदोजहद जारी  है।  हमने बड़े बड़े विज्ञापन के द्वारा टेलिविजन या समाचारपत्रों में, होर्डींग या पोस्टरों से यह तो बता रहे हैं की कोरोना से बचाव कैसे करें  या इसका उपाय क्या है।  लेकिन ये कोई नहीं बता पा रहा है या बताने की जरूरत समझता है की कितने मजदूर बेबस इंसान हजारों किलोमीटर पैदल चलने से या भूखे रहने से या नौकरी जाने से या डिप्रेशन में खुदकुशी करके और और सैकड़ों  मजदूर इस तालाबन्दी में रेल की चपेट में या सड़कों पे वाहनों की टक्कर से मर रहे है और इसकी सुध कौन लेगा या इसके लिए क्या नियमावली होनी चाहिये या इसके समाधान  क्या  है  और सरकार  का इनके ऊपर ध्यान क्यों नहीं जा रहा है या अपनी आँखे मूंद लेना चाहती है तो और कोई  पत्रकारिता वालों ने इसके ऊपर सरकार का  ध्यान क्यों नहीं दिला रहा या उसपे दबाब डालने की कोशिस कर  रहा है या कोई ठोस नियमावली राज्य सरकारें या केंद्र सरकारें क्यों नहीं बना रही है जिससे मजदूरों का समाधान निकल सके और जान भी बच जाये। जब भारत के निर्माता (मजदूर ) ही अपनी बेबसी की गाथा  हजारों किलोमीटर पैदल चलकर या  भूखे  रहकर कहने लगे तब हमें लगता है हमारा भारत कितना महान देश है ! 

अम्बाला में पैदल बिहार जा रहे दो प्रवासी मजदूरों को अज्ञात वाहन ने कुचला, एक की मौत, दूसरा घायल

तालाबन्दी के तीसरा चरण पूर्ण होने को है (लगभग 50 दिन ) और चौथे चरण की सुगबुहाट अभी से ही चल रही है लेकिन आज भी लाखों मजदूर हजारों किलोमीटर चलकर पैदल घर पहुँचना चाहते है और सरकार इनकी  कोई सुध नहीं ले रही है।  सरकार और प्रशासन का अलग अलग तर्क है की  अब तो ट्रेनें चलने लगी तो मजदूर पैदल क्यों चल रहे है और मजदूरों की भी अलग तर्क है कि खाने का तो पैसा है  नहीं  है तो टिकीट कहाँ से ख़रीदे। अलग अलग कारणों से जैसे पैदल चलने से ,सड़क दुर्घटना से,भूख से,पैसों की तंगी से या मेडिकल आपातस्थिति में  अबतक लगभग 624 मजदूरों की मरने की खबर आ रही है। और ना  जाने कितने गर्भवती माँ और बहनों ने इस महामारी के दौरान पैदल चलते हुए या किसी संसाधन के आभाव में सड़क पे ही अपनी बच्चे को जन्म देने पे मजबूर हुई है। और  जबकि यह कहा जाता  है की यह देश  संसाधनों  का देश है तब हमें लगता है हमारा भारत कितना महान देश है ! 

   

पैदल चलते एक मजबूर माँ ने सड़क किनारे अपने बच्चे को जन्म दी 
इस महामारी के दौरान देश के सभी डॉक्टरों, नर्सों, पुलिस, सफाईकर्मी एवं वो तमाम कोरोना वॉरियर जो दिन रात लगातार अपना काम ईमानदारी से  कर रहे है और बिना छुट्टी लिए कई कई घंटों और सप्ताहों तक लगातार अपनी जान को  जोखिम में रखकर दूसरों को  जान बचाने में लगे हुए है  ऐसे कोरोना वॉरियर को देश सलाम करता है और  नतमस्तक होता है।  हमारा  देश में  तो डॉक्टरों और नर्सों  को तो दूसरा भगवान का भी दर्जा दिया हुआ है और ऐसे में इस भगवान (डॉक्टरों और नर्सों) पे  तो फूलों की माला पहनानी चाहिए और पूजा भी जानी चाहिए लेकिन उनपर जानलेवा हमला, उनपर थूकना और डंडा से पीटने की खबरआती है और फिर भी ये धरती के भगवान अपने कर्तव्य से नहीं भागते हैं।और ये सब अपने ही लोग करते हैं तब हमें लगता है हमारा भारत कितना महान देश है ! 


 जब ऐसे समय में कोरोना महामारी से पूरी दुनिया लड़ रही है और अपने अपने देश के लोग  अपने तरीके से अपने  देश के साथ मजबूती से खड़े हैं और हमारा भारत  विभिन्ता में एकता कहलाने वाला देश आपस में ही वैमन्यस्य दिखा रहे है। हिन्दू मूस्लिम सिख ईसाई बौद्ध पारसी भारत माँ  सारे सिपाही आपस में है भाई भाई।  बचपन से ही सिखया जाता है या कितबों में पढ़ाया जाता है लेकिन ये क्या  ऐसे समय में जब भारत के सभी सिपाहियों एवं भाइयों को  कोरोना के इस विश्व्व्यापि महामारी से जहाँ साथ  में रहकर एवं  मिलकर लड़ने की जरूरत है वहाँ तो  भारत माँ के दो सपूत (हिन्दू - मुस्लिम ) आपस में ही लड़ रहे है और अपने अपने तरीके से देश भक्ति की परिभाषा गा रहे है और ये  कौन लोग है जो आपस में लड़ रहे है  ये वो मुठी भर लोग हैं  जिनका देश से कोई लेना देना नहीं हैं और अपने अपने धर्म के ठेकेदार बने बैठे हैं  इन्हे ना अपने देश से कोई लेना देना है और न धर्म से। जब इस धर्म के ठेकेदारों पे भारत चुप रहता है तब हमें लगता है हमारा भारत कितना महान देश है ! 


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